धनबाद। 26 जुलाई 1999... यह वही तारीख है जब भारतीय सेना ने जम्मू कश्मीर के करगिल में पाकिस्तानी सेना को हराया था लेकिन इस युद्ध में भारत ने अपने 527 जवानों को खो दिया था जबकि 1363 जवान घायल हुए थे। भारतीय जवानों ने इस युद्ध में अपने खून का आखिरी कतरा देश की रक्षा के लिए न्यौछावर कर दिया था। इन जांबाजों के शौर्य की कहानियां आज भी हमें गर्व महसूस करवाती हैं। कोयलांचल भी इसमें पीछे नहीं रहा था। करगिल वार में अपने दाहिने पैर को खोने वाले कोऑपरेटिव कॉलोनी सरायढेला के राजकुमार श्रीवास्तव आज भी युद्ध में अपने साथियों को याद करके भावुक हो जाते हैं तो करगिल से पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने का शौर्य भी उनके चेहरे पर झलकता है।
सेना के कोर ऑफ सिग्नल में तैनात थे राजकुमार
करगिल के द्रास सेक्टर में सेना के कोर ऑफ सिग्नल में बतौर नायक राजकुमार दुश्मन की सिग्नल को इंटरसेप्ट कर खुफिया जानकारियां जुटाते थे। 26 June 26 जून की सुबह अपने बंकर से निकलते ही दुश्मन का मोर्टार उनकी दाहिनी पैर पर गिरा। इस हमले में उनका पैर हमेशा के लिए बेकार हो गया। घायल राजकुमार सेना के कमांड हॉस्पिटल कोलकाता में 45 दिनों तक अचेत पड़े रहे। ठीक होने पर सेना से उन्हें रिटायरमेंट दे दी गई। वे वर्तमान में वरिष्ठ सचिवालय सहायक के रूप में केंद्रीय विद्यालय मैथन में तैनात है।
करगिल में दुश्मन ऊंचाई पर था
राजकुमार बताते हैं कि करगिल युद्ध में पाकिस्तानी घुसपैठिए हजारों फीट की ऊंचाई पर ऊंची पहाड़ियों पर डेरा जमाए हुए थे वहीं भारतीय सेना नीचे होने के कारण युद्ध दुर्गम था इस लड़ाई में हमारे सैनिक शहीद हो रहे थे लेकिन अदम्य साहस दिखाते हुए अंतत हमने 26 जुलाई करगिल पर फतेह हासिल किया।



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