Dhanbad। दशलक्षण पर्व के आठवें दिन उत्तम त्याग धर्म की आराधना हुई । प्रात 7 बजे भगवान का अभिषेक और शांति धारा की गई । आज के शांति धारा के पुण्यार्जक चक्रेश, अमित जैन और विजय विनीत जैन थे । समाज के प्रमोद जैन ने कहा की राग द्वेष से अपने को छुड़ाने का नाम त्याग है । त्यागना प्राणी का नैसर्गिक नियम है। वृक्ष में पत्ते, फल, फूल और वृक्ष उनका त्याग कर देता है । गाय जब तक अपने दूध का परित्याग नहीं कर देती उसे बेचैनी रहती है । संग्रह का विमोचन करने पर ही स्वस्थता और ताजगी आती है । यदि हमारे आगमन का द्वार खुला रहे और निकासी न हो तो रुका हुआ पानी सूख जाता है, सड़ जाता है । जो वृक्ष अपने फलों को लुटाते हैं उनमें बार-बार फल आते हैं और जो अपने फलों को छिपाते हैं, वे समूल नष्ट हो जाते हैं। यह सारे प्रकृति के उदाहरण हमें त्याग करने की प्रेरणा देते हैं। संग्रह ही जीवन को दुखदायी बना देता है, जबकि त्याग जीवन को स्वस्थ और संतुलित बनाता है।जिसने त्याग किया है संसार में उसका सम्मान हुआ है। जिसने संग्रह किया, उसका संसार में पतन हुआ है। यही कारण है कि जल का दान करने वाले मेघ सदैव ही ऊपर रहते हैं और संग्रह करने वाला समुद्र सदा ही नीचे रहता है। त्याग और दान का सही प्रायोजन तभी सिद्ध होता है जब हम जिस चीज का त्याग कर रहे हैं या दान कर रहे हैं उसके प्रति हमारे मन में किसी प्रकार का मोह या मान सम्मान पाने का लोभ न हो। त्याग के बिना मनुष्य की शोभा नहीं होती। बिरले लोग ही त्याग धर्म को अपनाकर आत्मिक निधि प्राप्त करते हैं। आज के कार्यक्रम में थे संजय गोधा, सुशील बाकलीवाल, प्रमोद जैन, संतोष जैन, मयंक जैन, रजत जैन, अंशी जैन, साधना जैन, कामना जैन,उषा जैन ,संतोष देवी, नीलम गोधा, रिद्धि गोधा आदि थे ।



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