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दसलक्षण पर्व के नौवें दिन उत्तम अकिंचन्य धर्म की हुई पूजा

 


Dhanbad: दसलक्षण पर्व के नौवें दिन उत्तम अकिंचन्य धर्म की पूजा हुई। प्रात अभिषेक और शांतिधारा हुई, आज के शांति धारा के पुण्यार्जक  सुशील, साधना बकलिवाल और भगवती देवी थे। समाज के प्रमोद जैन ने कहा कि आकिंचन्य धर्म की भावना करो कि यह आत्मा शरीर से भिन्न है, ज्ञानमयी है, उपमा रहित है,वर्ण रहित है, सुख संपन्न है, परम-उत्कृष्ट है, अतीन्द्रिय है, और भयरहित है,इस प्रकार से आत्मा का ध्यान करो, यही आकिंचन्य है । सर्व परि


ग्रह से निवृत्त होना आकिंचन्य व्रत है, शुभध्यान करने की शक्ति का होना आकिंचन्य है, ममत्तव से रहित होना आकिंचन्य व्रत है । और रत्नत्रय में प्रवृत्ति होना आकिंचन्य व्रत है । मै किसीका नही, कोई मेरा नही यह अन्यत्व भावना के साथ अपरिग्रह शुरु होता है, वस्तुए सिमित करना, छोड देना, भेद विज्ञान का चिंतन करना, से लेकर वस्त्र, गृह, बर्तन, पात्र का त्याग कर सम्पुर्ण ऐहिक दरिद्रता ही अकिंचन्य है। इसे बढाते हुए, ये कर्म को भी निर्जरा, उदीरणा करके छोड देकर कर्ममुक्त होना अकिंचन्य का परीसीमा है। तुषमात्र भी परिग्रह ना रख मुनिगण इस अकिंचन्य धर्म का वस्तुपाठ प्रस्तुत करते है। जो अकिंचन हुआ, वह अनंत काल के सुखी होने के लिये कुछ आगे बढा। शरीर का ममत्व हटाये बगैर अकिंचन्य परिपुर्ण नही।  कार्यक्रम में मनीष शाह, मुकेश गंगवाल, बिनोद गंगवाक, मनीष झांझरी, संजय गोधा, बिनोद गोधा, चक्रेश जैन, तारा देवी जैन, रेणु जैन, शिल्पा जैन, उर्मिला गोधा, प्रीति जैन,सपना जैन आदि मौजूद थे। 




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