धनबाद। झारखंड बांग्ला भाषा उन्नयन समिति कि केंद्रीय अध्यक्ष रीना मंडल झारखंड में बांग्ला भाषा को मान्यता देने के लिए लंबे समय से संघर्षरत हैं। उन्होंने बताया कि बांग्ला भाषा झारखंड के मूल भाषा है जिसकी घोर अवहेलना की गई। झारखंड ऐतिहासिक रूप से सदैव भी बंगाल का हिस्सा रहा है। बंगाल के सेन वंश और पाल वंश के शासनकाल के दौरान बिहार और झारखंड बंगाल का हिस्सा हुआ करते थे। बंगाल के सेनवंश और पाल वंश के सम्राटों के शासनकाल के दौरान बंगाल की सीमा के अंतर्गत बिहार और झारखंड का अधिकतर हिस्सा आता था। बिहार में दरभंगा का प्राचीन नाम द्वारबंग था अर्थात बंगाल का प्रवेश द्वार। झारखंड बांग्ला भाषा उन्नयन समिति कि केंद्रीय अध्यक्ष रीना मंडल में ने बताया कि
2000 से पहले ऐतिहासिक रूप से झारखंड का कोई अस्तित्व नहीं था
सन 2000 से पहले ऐतिहासिक रूप से झारखंड का कोई अस्तित्व नहीं था। यह इलाका हजारों वर्षों से ऐतिहासिक रूप से बंगाल के राढ़ अंचल का हिस्सा रहा है। बांग्ला भाषा की उत्पत्ति पूर्वी राढ़ अंचल में हुआ था। मुगलकाल में और बंगाल के मुर्शिदाबाद के नवाबों के शासनकाल के दौरान ही यह इलाका बंगाल का हिस्सा ही रहा है।संथाल परगना अंग्रेजों के दिए गए इस नाम से इस इलाके को संथालो के इलाकों के रूप में प्रचारित किया गया है। लेकिन वास्तव में संथाल इस क्षेत्र के लिए बाहरी लोग हैं जिन्हें अंग्रेजों ने सन 1790 और 1850 के बीच बाहर से लाकर बसाया है। संथाल परगना क्षेत्र के मूल और प्राचीन निवासी घटवाल /घटवार खैतोरी ,पहाड़िया जनजाति और बंगला बोलने वाली विभिन्न प्रकार की जातियां इस क्षेत्र के प्राचीन निवासी है। संथालो को इस इलाके में भारी संख्या में अंग्रेजों द्वारा बसाया गया जिसे यहां के मूल निवासी अल्पसंख्यक हो गए और उनकी भाषा संस्कृति एक प्रकार से समाप्त हो गई। संथाल परगना का इलाका ऐतिहासिक रूप से सदैव भी बंगाल का ही हिस्सा रहा है संथाल परगना का इलाका बंगाल के राढ़ अंचल का हिस्सा रहा है। और इस इलाके पर सदैव भी बंगाल के पाल वंश और सेन वंश के शासकों का शासन रहा और कालांतर में मुर्शिदाबाद के नवाबों का शासन रहा।
बांग्ला भाषा इस इलाके में 1000 वर्षों से बोली जा रही है
बांग्ला भाषा इस इलाके में पिछले 1000 वर्षों से बोली जा रही है। बांग्ला भाषी लोग संथाल परगना के सबसे प्राचीन निवासीयो में से एक है। इस इलाके को संताल परगना के रूप में प्रचारित करने से यहां के बाकी मूल निवासियों की भाषा संस्कृति को एक प्रकार से दरकिनार कर दिया गया है। आज से 50 साल पहले संथाल परगना इलाके में सैकड़ों की संख्या में बंगला मीडियम स्कूल चलते थे परंतु अभी 90% से ज्यादा बंद हो चुके हैं। फिर भी जब यह क्षेत्र बिहार के अंतर्गत था उस समय काफी स्कूल में बांग्ला भाषा की पढ़ाई होती थी परंतु झारखंड बनने के बाद बंगला भाषा की पढ़ाई बंद कर दी गई है। संथाल परगना क्षेत्र के जमीन के अधिकतर खतियान और जमीन जायदात के कागजात बांग्ला भाषा में ही है।कतरासगढ़, टुंडी, नगरकियारी, पांड्रा और झरिया ब्रिटिश राज और उससे पहले बंगाल के मुर्शिदाबाद के नवाबों के शासनकाल के दौरान उनके अधीन थे स्वतंत्र स्टेटस थे इन राज परिवारों के वंशज आज भी मौजूद है और यह सभी बंगला ही बोलते हैं इन सभी स्टेटस में सभी प्रकार के राजकीय कामकाज जमीन जायदात के कागजात और लेखा-जोखा सभी प्रकार के दस्तावेज और पढ़ाई-लिखाई की भाषा बांग्ला ही थी।
मानभूम का 75 प्रतिशत इलाका बिहार को मिला
राढ़ अंचल प्राचीन और मध्यकाल बंगाल के सेनवंशीय और पाल वंश के नरेंशों के शासनकाल में बंगाल के 4 प्रांतों में से एक था। यह प्रांत थे- 'वरेंद','बागरा','बंग', 'राढ़'। बिहार का भागलपुर और बांका जिला झारखंड का संपूर्ण संथाल परगना, गिरिडीह, हजारीबाग, रामगढ़, बोकारो, धनबाद जिला और रांची जिला का आधा हिस्सा पूर्वी एवं पश्चिमी सिंहभूम और सरायकेला खरसावां जिला राढ़ भूमि के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित है अर्थात यह क्षेत्र पश्चिमी राढ़ अंचल के अंतर्गत आता है। झारखंड राज्य तो बहुत बाद में बना। मानभूम डिस्ट्रिक्ट मैप 1956 में दिया हुआ है। 1956 में मानभूम डिस्ट्रिक्ट को पूरी तरह से बंगाल में जाना चाहिए था। परंतु मानभूम जिला का केवल 25% हिस्सा बंगाल को मिला जिसे आजकल पुरुलिया डिस्ट्रिक्ट के रूप में जाना जाता है। मानसून का 75% इलाका बिहार को मिला था पूरा का पूरा धनबाद जिला बिहार को दे दिया गया। मानभूम (धनबाद जिला और चास चंदनकियारी प्रखंड) की भाषा केवल मानभूमि बंग्ला है।
बांग्ला भाषियों को हेय दृष्टि से देखा गया
खोरठा वास्तव में बिहार की मगही भाषा का झारखंडी रूपांतर है। खोरठा भाषा का प्रचलन मानभूम क्षेत्र में मगध क्षेत्र अर्थात गया ,जानाबाद,नालंदा ,नवादा ,मुंगेर की तरफ से 300 साल पहले आकर बसने वाले प्रवासियों ने किया है। भाषा वैज्ञानिकों ने खोरठा भाषा को पूर्वी मगही कहा है। खोरठा भाषा वास्तव में 80% से ज्यादा मगही है और बाकी 20% बांग्ला भाषा के सब मिश्रित है। जब 1956 में मानभूम जिला का बिहार और बंगाल के बीच बंटवारा हो रहा था तब उस समय की तत्कालीन डॉ श्री कृष्ण सिंह कि बिहार सरकार ने मानभूम जिला का अधिकतर इलाकों को बिहार में रखने के लिए पूरी तत्परता दिखाई थी। जबकि बंगाल के बी सी रॉय की सरकार कान में तेल डाल कर सो रहे थे और उन्होंने मानभूम जिला को बंगाल में लेने में कोई विशेष रूचि नहीं दिखाई थी। बांग्ला भाषियों को कभी अपना समझा ही नहीं बल्कि उनकी अलग संस्कृति के कारण उनको हेय दृष्टि से देखा। बिहार सरकार ने पूरी चालाकी दिखाते हुए धनबाद का पूरा कोलफील्ड इलाका हड़प लिया और बचा हुआ केवल 30% इलाका बंगाल को पुरुलिया डिस्ट्रिक्ट के रूप में दे दिया।


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