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रेलवे बना धनबाद में राजनीति का अखाड़ा, डीआरएम ने पहले महापौर को दिया आमंत्रण फिर प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए मना किया




धनबाद: धनबाद से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने रेलवे प्रशासन की कार्यशैली और राजनीतिक संतुलन दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नई ट्रेन के परिचालन के शुभारंभ जैसा महत्वपूर्ण अवसर अचानक विवादों में घिर गया, जब धनबाद के महापौर संजीव सिंह और झरिया विधायक रागिनी सिंह को दिए गए आधिकारिक आमंत्रण को कार्यक्रम से ठीक एक घंटे पहले रद्द कर दिया गया। यह पूरा घटनाक्रम अब “प्रशासनिक चूक” से कहीं आगे बढ़कर “सियासी हस्तक्षेप” की शक्ल ले चुका है। दरअसल, 03 अप्रैल 2026 को जारी आधिकारिक पत्र में पूर्व मध्य रेलवे, धनबाद मंडल की ओर से महापौर संजीव सिंह को 06 अप्रैल को धनबाद स्टेशन पर गाड़ी संख्या 13379/80 (धनबाद–लोकमान्य तिलक टर्मिनस एक्सप्रेस) के शुभारंभ समारोह में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया था। इस पत्र में उनकी “गरिमामयी उपस्थिति” की अपेक्षा जताई गई थी। तैयारियां भी उसी अनुरूप हुईं. मंच सजा, पोस्टर लगे, और बैनरों में सांसद ढुल्लू महतो, विधायक राज सिन्हा के साथ महापौर और विधायक रागिनी सिंह के नाम प्रमुखता से उभरे।

      लेकिन, जैसे ही कार्यक्रम का समय नजदीक आया, कहानी ने अचानक करवट ले ली। 06 अप्रैल 2026 को एक दूसरा पत्र जारी हुआ, जिसमें पहले भेजे गए निमंत्रण को “रेलवे बोर्ड के निर्देशों के अनुरूप नहीं” बताते हुए रद्द कर दिया गया। यह भी कहा गया कि ऐसे कार्यक्रमों में केवल सांसद और विधायक की उपस्थिति ही अनुमन्य है। यानी तीन दिन पहले सम्मान का निमंत्रण और ऐन वक्त पर “गलती” का हवाला देकर अपमान! सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि निर्णय के साथ ही कार्यक्रम स्थल से उन सभी पोस्टरों और बैनरों को आनन-फानन में हटा दिया गया, जिनमें महापौर और झरिया विधायक के नाम थे। यह जल्दबाजी केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि किसी गहरे दबाव की ओर इशारा करती नजर आई।

        इस पूरे घटनाक्रम के सामने आते ही शहर का माहौल गरमा गया। महापौर संजीव सिंह के समर्थकों ने इसे सीधा अपमान करार देते हुए विरोध जताया। खुद महापौर ने भी तीखा तंज कसते हुए कहा कि “रेलवे ने जिनका BP बढ़ा है, उनका BP कम करने का काम किया है—बाघमारा, धनबाद या दिल्ली एम्स में अच्छे डॉक्टर हैं, जाकर इलाज करा लें।” यह बयान न केवल नाराजगी का इजहार था, बल्कि रेलवे की निर्णय प्रक्रिया पर सीधा सवाल भी।

       अब असली सवाल यही है कि अगर रेलवे बोर्ड के नियम पहले से स्पष्ट थे, तो निमंत्रण जारी ही क्यों किया गया? क्या यह महज लापरवाही थी या फिर अंतिम समय में किसी “अदृश्य राजनीतिक दबाव” के चलते पूरा फैसला पलट दिया गया?

        स्थानीय जानकारों का मानना है कि यह घटना केवल एक प्रोटोकॉल विवाद नहीं, बल्कि उस सियासी संस्कृति की झलक है, जहां उद्घाटन जैसे कार्यक्रम भी “श्रेय लेने की होड़” का अखाड़ा बन जाते हैं। जनप्रतिनिधि सिर्फ एक व्यक्ति नहीं होते, वे हजारों लोगों की आवाज होते हैं। उन्हें आमंत्रित कर फिर सार्वजनिक रूप से दरकिनार करना लोकतांत्रिक परंपराओं पर सीधा आघात है।

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