धनबाद। सिखों के छठे गुरु श्री गुरु हरगोविंद सिंह साहिब का दो दिवसीय प्रकाशोत्सव 10 और 11 जून को गुरुद्वारा गुरु नानक पुरा जोड़ा फाटक में आस्था और श्रद्धा के साथ मनाया जायेगा। प्रकाश पर्व को लेकर गुरद्वारा की आकर्षण लाइटिंग की गई है।
2 दिनों तक बहेगी भक्ति की रसधार
दो दिवसीय कार्यक्रम की शुरुआत 10 जून को सुबह भक्त संत कबीर के प्रकाश पर्व के साथ होगी। संध्या में गुरु हरगोविंद सिंह जी के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डाला जाएगा। 11 जून को गुरु नानकपूरा गुरुद्वारा परिसर में सुबह 10 बजे से मुख्य दीवान सजेगा। स्थानीय बच्चे कीर्तन से गुरु का यश गान करेंगे। रागी जत्था भाई नवनीत सिंह जी चंडीगढ़ वाले और कथा वाचक भाई सुरेंद्र सिंह जी परमेश्वरद्वार वाले शब्द गायन और कथा वाचन से संगत को मंत्र मुक्त करेंगे। इसके बाद गुरु का अटूट लंगर बरसेगा। संध्या में भी कथा कीर्तन से गुरु की महिमा की जायेगी।
धर्म व मानवीय मूल्यों के सशक्त पक्षधर थे गुरु हरगोबिंद जी
गुरु अरजन साहिब के लाहौर में बलिदान के बाद गुरुगद्दी पर छठें गुरु के रूप में आसीन होने के बाद गुरु हरगोबिंद जी धर्म व मानवीय मूल्यों के सशक्त पक्षधर बन कर उभरे। वह पहले गुरु थे, जिन्होंने दो तलवारें धारण कीं, जिनमें एक धर्मसत्ता व दूसरी राजशक्ति का प्रतीक थी।अमृतसर में श्री हरिमंदिर साहिब के ठीक सामने श्री अकाल तख्त साहिब का निर्माण करा कर उन्होंने संदेश दिया कि संसार में वास्तविक राज्य परमात्मा का है। समस्त सांसारिक शक्तियों का धर्म की मर्यादा में रहना ही श्रेयस्कर है। गुरु हरगोबिंद जी ने बलिष्ठ व वीर युवकों को सम्मिलित कर प्रथम सिख सेना का गठन भी किया। उनसे जब इन परिवर्तनों पर प्रश्न किए गये, तो गुरु साहिब ने कहा कि उनका सोच व आचार, त्याग एवं अध्यात्म आधारित ही है, भले ही प्रकट रूप राजसी है। ये शस्त्र निर्बल की रक्षा व अन्यायी के नाश के लिए हैं। उन्होंने भविष्य में इसे सिद्ध भी किया। एक बार मुगल शासक जहांगीर ने उन्हें धोखे से कैद कर लिया व ग्वालियर के किले में बंदी बनाकर रखा। जब जहांगीर को अपनी भूल का एहसास हुआ तो उसने गुरु साहिब को रिहा करने का आदेश दिया। गुरु साहिब ने शर्त रखी कि वे तभी किले से बाहर आएंगे, जब वहां पहले से बंदी 52 हिंदू राजाओं को भी छोड़ा जाएगा। बंदी हिंदू राजाओं को मुक्त कराकर ही गुरु साहिब बाहर आये। अमृतसर पहुंचने पर सिखों ने भव्य दीपमाला का आयोजन किया। संयोग से उस दिन दीवाली थी। तब से श्री हरिमंदिर साहिब में दीवाली के दिन दीपमाला की जाती है। इसे बंदीछोड़ दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। बाद में जहांगीर जब तक जीवित रहा, गुरु साहिब से संबंध बनाकर रखे। गुरु हरगोबिंद जी ने धर्म प्रचार यात्राएं कीं और स्थान-स्थान पर लोगों को परमात्मा से जोड़ा। एक बार अपने द्वारा ही बसाये गए महिराज नामक स्थान पर गुरु साहिब के दरबार में भाई काला नामक एक श्रद्धालु अपने दो भतीजों के साथ आया। उनमें से एक बालक फूल वस्त्रहीन था। वह गुरु साहिब के सामने आकर अपना पेट बजाने लगा। भाई काला ने गुरु साहब को बताया कि यह अनाथ व भूखा है। गुरु साहिब ने उस बच्चे को बहुत से वर दिए, बाद में उसी फूल के वंशज पंजाब की नाभा, पटियाला व जींद रियासतों के शासक बने। इन्हें फुलकियां राज्य भी कहा जाता है।
इनकी रहेगी सहभागिता
कार्यक्रम को भव्य और आकर्षक रूप देने में गुरुनानकपुरा गुरुद्वारा के प्रधान बलवीर सिंह राजपाल, सचिव राजेंद्र सिंह चावला, कोषाध्यक्ष जगजीत सिंह चावला, सतपाल सिंह, लाल सिंह, हरभजन सिंह, रविंदर सिंह राजपाल, गुरदीप सिंह, हरजीत सिंह राजपाल, प्रबंधक कुलदीप सिंह, सरदूल जी एवं अन्य सक्रिय है।


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